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स्मृति नगर गृह निर्माण सहकारी संस्था के चुनाव में जमीन आवंटन में हुई बंदरबांट के मामले ने पकड़ा तूल

  • संस्था के चुनावी समर में बायलाज को ताकपर रख कर की गई है जमीन की खरीदी बिक्री के मामलों को बना रहे हैं मुद्दा
  • सोसायटी के लोगों ने सदस्यों ने रजिस्ट्रार फर्म एवं सहकारी संस्थाएं से शिकायत कर सदस्यों की वैधानिकता पर उठाए हैं सवाल

भिलाई. स्मृति नगर गृह निर्माण सहकारी संस्था के जमीन आवंटन में हुई बंदरबांट का मामला सोसायटी के चुनावी समर में तूल पकड़ने लगा है। उम्मीद्दवार प्रचार प्रसार के साथ पुराने मामलों को लेकर एक दूसरे के खिलाफ गढ़े मुर्दे उखाड़ रहे हैं और लोग इसका मचा भी ले रहे हैं। यहां लोगों के बीच जमीन आवंटन में हुई गड़बड़ी का मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है।

संस्था के सदस्यों की मानें तो स्मृति नगर गृह निर्माण सहकारी संस्था के बायलॉज और रजिस्ट्री की शर्तों के अनुसार संस्था से जमीन खरीदेने वाले क्रेता सदस्य कम से कम 10 साल तक उस भूखंड व उस पर बनाए गए भवन का हस्तांतरण नहीं कर सकता है,लेकिन संस्था की जमीन खरीदी बिक्री को लेकर हुई शिकायत पत्रों पर गौर करें तो सबसे ज्यादा शिकायतें इसी मामले को लेकर है। संस्था के इसी शर्त की सबसे ज्यादा धज्जियां उड़ाई गई है। शिकायत पत्र में ऐसे लोगों के नाम है जो संस्था के जिम्मेदार पदों पर हैं। जिन्होने संस्था की जमीन को खरीदी बिक्री का केन्द्र बना लिया है। जमीन खरीदी के साल दो साल बाद भूखंड की बिक्री/हस्तांतरण किया गया है। जबकि शर्त के मुताबिक यदि 10 साल की अवधि के अंदर संस्था के क्रेता सदस्य को भूखंड व उस पर बने भवन के हस्तांतरण की आवश्यकता पड़ता है तो उसे भूखंड को संस्था के पक्ष में समर्पित करना होगा और भूखंड मद में जमा की गई राशि धनराशि वापस प्राप्त करने के लिए हितग्राही होगी। राशि की वापसी के लिए संस्था जिम्मेदार होगा। उसे वह डाकघर व बचत दर पर साधारण ब्याज की दर से क्रेता सदस्य को भुगतान करेगा, लेकिन बायलाज के इस शर्त का कभी पालन ही नहीं हुआ है। इसी विषय को लेकर सोसायटी के कुछ लोगों ने सयुंक्त पंजीयक, रजिस्ट्रार फर्म एवं संस्थाएं में इसकी शिकायत की है।जहां सुनवाई चल रही है। जिसे आप इन प्रकरणों के माध्यम से समझ सकते हैं….

केस नंबर-1
संस्था के नियमानुसार श्री राजीव चौबे ने शुल्क जमा कर संस्था से सदस्यता 2163 ली और जून 2003 को सड़क नंबर 22 स्थित भूखंड क्रमांक बी 712 के 2400 वर्गफीट जमीन संस्था से खरीदा। 6 साल बाद नवंबर 2009 को उन्होंने उक्त भूखंड को सड़क नंबर 6 निवासी रीता तिवारी पिता वाय डी उपाध्याय उम्र 38 को बेच दिया। संस्था के बायलॉज और रजिस्ट्री की शर्त के अनुसार चौबे को उक्त भूखंड को संस्था को समर्पित करना था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। जिस मकान में वह रहते हैं, वह भूखंड संस्था की नहीं, निजी व्यक्ति से खरीदी हुई जमीन है। उस अतिरिक्त भूमि को शामिल कर मकान कुल 2415 वर्गफीट भूमि में मकान बनवाया है। प्रायवेट भूखंड होने की वजह से वह संस्था के ले आउट में शामिल नहीं ह और नगर तथा तथा ग्राम निवेश द्वारा अनुमोदित है। उसी भूखंड से लगे हुए उनके पास 7515 वगफीट जमीन है।  जिसे संस्था के लोगों ने बायलॉज के नियमानुसार अवैधानिक बताते हुए और अपने अध्यक्ष पद का दुरुपयोग करने की सयुंक्त पंजीयक, सहकारी संस्थाएं फर्म एवं सोसायटी से शिकायत की है। जिस पर सुनवाई चल रही है।

केस नंबर-2
चूंकि स्मृति नगर गृह निर्माण सहकारी संस्था की सड़क 22 पर स्थित आवासीय भूखंड बी 712 जिसे रीता तिवारी पिता डॉ वाय डी उपाध्याय ने श्री चौबे से खरीदा है। चूंकि संस्था के बायलॉज के अनुसार सहकारी संस्था में पत्नी- पति दोनों में से एक को भूखंड आवंटन की पात्रता दी गई है। इस शर्त का तोड़ निकालते हुए रीता तिवारी ने जमीन की रजिस्ट्री में पति के नाम के बजाय पिता का उल्लेख किया। क्योंकि उसके पति श्री शिखर तिवारी के नाम पर पहले से ही संस्था में सदस्यता क्रमांक 1688 पर आवासीय भूखंड है। यानी क्रेता ने संस्था की शर्तो को जानते हुए भूखंड हासिल करने के लिए दोष पूर्ण शपथ पत्र दिया गया। जिसे रहवासियों ने जांच करने की मांग की है। उन्होंने उप पंजीयक को यह भी बताया कि संस्था के निर्वाचन में वह प्रत्याशी है।

केस नंबर-3
संस्था की जमीन बेचने के लगभग एक साल बाद उपाध्यक्ष वाईएल नरसिम्हन द्वारा श्री चौबे को जुलाई 2010 में अलग अलग साइज के दो-दो भूखंड विक्रय किया है। जो कि सोसायटी के अतिरिक्त भूमि है। यानी नगर तथा ग्राम निवेश विभाग से एप्रुव्ड ले आउट के प्लॉटस के अतिरिक्त भूखंड है। जिसे उपाध्यक्ष वाईएल नरसिम्हन द्वारा अध्यक्ष श्री चौबे को बेचा गया है। इस मामले को भी सोसायटी के सदस्यों ने उठाया है। सदस्यों ने भूखंड आवंटन के लिए उपाध्यक्ष द्वारा किए गए जमीन विक्रय की जांच मांग की है। सदस्यों ने अपनी शिकायत में यह कहा गया है कि टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग से एप्रुव्ड ले आउट में इस साइज के प्लाट्स ही नहीं है। उपाध्यक्ष ने सोसायटी के अतिरिक्त भूखंड के खसरा नंबर 286/1 रकबा 1800 वर्गफीट और खसरा नंबर 286/1 का टुकड़ा 900 वर्गफीट की रजिस्ट्री की गई। जो कि जांच का विषय है।

केस नंबर-4
संस्था के प्रबंध संचालक मंडल ने बायलाज के विपरीत जाकर सिविल कांट्रेक्टर सुदीप अग्रवाल जो वित्तीय संबंध रखता है, उसे संस्था की खसरा नंबर 286/1 का टुकड़ा प्लॉट 593 बी रकबा 2400 वर्गफीट का भूखंड 13 फरवरी 2008 को विक्रय किया है। जबकि संस्था के बायलाज के उपविधि 14 मुताबिक वित्तीय संबंध रखने वाले व्यक्ति जैसे ठेकेदार, सप्लायर्स, विक्रेता, एजेंट तथा उनके जमानतदार को संस्था का अंश/भूखंड विक्रय नहीं जा सकता।ऐसे व्यक्ति प्रबंध समिति के नाम मात्र का सदस्य तो बन सकता है, परंतु नाम मात्र के सदस्य को अंश विक्रय नहीं किए जा सकता। यानी ठेकेदार स्थायी सदस्य नहीं बन सकता और न ही उसे भूखंड आवंटन किया जा सकता है, लेकिन स्मृति गृह निर्माण के जिम्मेदारों ने सुदीप अग्रवाल सिविल कांट्रेक्टर है यह जानते हुए भी बायलाज के विरूद्ध जाकर उसे प्लॉट विक्रय किया है। बाद में उसी प्लॉट को अध्यक्ष राजीव चौबे ने 13 जुलाई 2010 को अपने खुद के लिए क्रय कर पंजीयन कराया है। जो सहकारिता के विधि के विपरीत बताते हुए जांच कराने की मांग की है।

 

केस नंबर-5
सोसायटी के लोगों का यह भी शिकायत है कि स्मृति गृह निर्माण सहकारी मर्यादित संस्था के टाउन एवं कंट्री प्लानिंग विभाग से एप्रुव्ड नक्शा में प्लाट, सड़क नंबर एक से शुरू होता है और सड़कों के बढ़ते हुए क्रम संख्या के अनुसार भूखंड का क्रमांक तय किया गया था, लेकिन अध्यक्ष चौबे के कार्यकाल में सड़क नंबर 32 पर स्थित भूखंड को क्रमांक-1 बताते हुए रजिस्ट्री करवाई है। जिसका टाउन एवं कंट्री प्लानिंग डिपार्टमेंट से अनुमोदन नहीं है।

 

सोसायटी के जानकारों का कहना है कि संस्था के एप्रुव्ड ले आउट में “ए’ टाइप के भूखंड का साइज 50 गुणा 40 यानी 4000 वर्गफीट का प्लॉट है जो कि संस्था के सबसे बड़ा प्लॉट है। इसके बाद 40 गुणा 60 यानी 2400वर्गफीट का प्लॉट्स है।जिसे “बी’ टाइप प्लाट कहा जाता है। 30 गुणा 50 यानी 1500 वर्गफीट का प्लॉट्स है। जिसे सी टाइप प्लाट्स कहा जाता है, लेकिन संस्था के जिम्मेदार लोगों ने अपने हिसाब से ले आउट की सड़क और भूखंड का साइज और क्रमांक तय कर भूखंड बेचा है। जिसकी शिकायत की गई है। शिकायत के बाद विभाग से ले आउट संशोधन के लिए पत्र व्यवहार किया गया, लेकिन नगर तथा ग्राम निवेश ने ले-आउट में किसी भी प्रकार से संशोधन करने से ही साफ इनकार दिया है। इसके बावजूद भूखंड की बिक्री जारी रहा।

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