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भगवान महाकाल की पालकी यात्रा में परिवर्तन को लेकर दो धड़े में बंटे पुजारी

उज्जैन. भगवान महाकाल की सवारी में पालकी के स्थान पर रथ को शामिल करने के प्रस्ताव पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। पुजारी, पुरोहित पालकी की परंपरा में रथ को शामिल कर नवाचार करने की बात रख रहे हैं तो वहीं लोग अनादिकाल से चली आ रही पालकी की परंपरा को कायम रखने पर जोर दे रहे हैं।

इधर जिला प्रशासन ने श्रावण-भादौ मास में निकलने वाली भगवान महाकाल की पालकी यात्रा को लेकर बुधवार को बैठक बुलाई थी, लेकिन पुरोहित बैठक में शामिल नहीं हुए और कोरम के अभाव में बैठक को स्थगित कर दिया गया। बताया जा रहा है कि पालकी की परंपरा में परिवर्तन को विषय को लेकर पुजारी और पुरोहितों में दो फाड़ हो गया है। एक पक्ष परिवर्तन चाह रहे हैं तो दूसरा पक्ष वर्षों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन करने पर जोर दे रहे हैं। पालकी यात्रा को लेकर चल रहे मनभेद के चलते अधिकांश पुजारी और पुरोहित बैठक में नहीं आए।

भगवान महाकाल की चलित मूर्ति का कराया जाता है शहर भ्रमण

बता दें कि श्रावण-भादौ मास में हर साल भगवान महाकाल की चलित मूर्ति को पालकी और हाथी में सवार शोभायात्रा निकाली जाती है। ताकि जिन भक्तों को पालकी में सवार भगवान महाकाल की मूर्ति की सुविधा से दर्शन नहीं हो पाते हैं, वे हाथी पर विराजित भगवान महाकाल की मूर्ति के दर्शन कर सकते हैं। इसके लिए दोनों मूर्तियों को एक जैसा बनवाया गया है। भगवान के एक मुखारविंद मनमहेश तथा चंद्रमौलेश्वर को हाथी पर विराजित कर नगर भ्रमण कराने की यह परंपरा वर्षों से चल रही है, लेकिन कुछ पुरोहित और पुजारी पालकी और हाथी की सवारी की परंपरा में परिवर्तन का विचार कर रहे हैं।

पालकी और शाही सवारी

महाकाल मंदिर में भगवान महाकाल की चलित मूर्ति में दो मुखारविंद मनमहेश तथा चंद्रमौलेश्वर एक जैसे हैं। परंपरा अनुसार श्रावण-भादौ मास की पहली सवारी में मनमहेश अथवा चंद्रमौलेश्वर में से जो मुखारविंद पालकी में निकाला जाता है, दूसरी सवारी से शाही सवारी तक वही मुखारविंद हाथी पर विराजित रहता है।

परिवर्तन क्यों – पं. महेश पुजारी 

पालकी की परंपरा को कायम रखने के पक्षधर पं. महेश पुजारी बताते हैं कि हमारे पूर्वजों ने भगवान के मुखारविंद को पालकी में तथा दूसरे मुखारविंद को हाथी पर निकालने की परंपरा ही इसलिए शुरू की थी कि जिन भक्तों को पालकी में भगवान के दर्शन नहीं हो पाए हों, वे हाथी पर विराजित भगवान के दर्शन कर सकते हैं। दोनों मूर्तियां एक जैसी हैं, दोनों की एक समान पूजा की जाती है, दोनों के दर्शन से एक समान पुण्य फल प्राप्त होता है। जब कोई समस्या ही नहीं है, तो परिवर्तन का विचार क्यों किया जा रहा है, यह बात समझ से परे है।

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पुजारी, पुरोहित के पुरखों को पहले से ही पता था कि पालकी की ऊंचाई कम है। सवारी के दिन पालकी की सजावट करते समय आसपास फूलों की लड़ियां लटका दी जाती हैं। इसलिए मकानों की छत व छज्जों में बैठने वाले भक्तों को भगवान के दर्शन नहीं हो पाते हैं। इसलिए हाथी पर भगवान का मुखारविंद निकालने की परंपरा शुरू की गई। नवाचार की सोच रखने वाले पुजारी, पुरोहितों को अगर परिवर्तन करना है तो पालकी की सज्जा में करना चाहिए।

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