Homeराजनीतिईश्वर का अंश हो गया समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव

ईश्वर का अंश हो गया समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव

बचपन से ही उन्हें पहलवानी का शौक था। न जाने कितनों को उन्होंने चरखा दांव लगाकर अखाड़ों में पटका होगा। अखाड़े की खूबी होती है कि कुश्ती के समय वहां सब प्रतिद्वंदी होते हैं लेकिन बाहर सब दोस्त। मुलायम सिंह यादव राजनीति में आए तो उनका मूल सिद्धांत यही बना रहा। उनके वैचारिक, राजनीतिक दुश्मन ढेर सारे थे और व्यक्तिगत दुश्मन कोई नहीं। या यह कह लीजिए कि सब उनके दोस्त थे।

मुलायम सिंह यादव जितने बड़े राजनेता थे, उससे बड़े जननेता थे। अगर आप उनसे मिल लें तो अहसास होता था कि किसी अपने से मुलाकात कर रहे हैं। यही वजह है कि उनसे बड़े, उनके बराबर के और उनसे छोटे सब नेताजी के प्रशंसक थे। दूसरों की बात सुनना और उनकी समस्याओं का समाधान ढूंढ़ना मुलायम सिंह यादव को असली नेता बनाती थी। उत्तर प्रदेश की राजनीति में पत्रकारों से मधुर संबंधों के लिए भी नेताजी जाने जाते थे।

वह मुख्यमंत्री रहे हों या रक्षामंत्री रहे हों लेकिन पत्रकारों के लिए वह बहुत ही ज्यादा सुलभ थे। उनको कवर करने वाले किसी भी पत्रकार से पूछ लीजिए तो उनके पास सुनाने के लिए ढेर सारे किस्से होंगे। नेताजी भी अक्सर पत्रकारों को बिठाकर अपने जमाने के तमाम किस्से सुनाया करते थे। बताते थे कि कैसे साइकिल से राजनीति शुरू की। फिर कैसे उनके पास एक जीप आई। कैसे सियासत को उन्होंने आगे बढ़ाया।

नेताजी के पास ढेर सारे टिप्स भी होते, जो वह पत्रकारों को बताया करते थे। जैसे कि एक चुनाव में दिल्ली, लखनऊ के तमाम पत्रकार सैफई में थे। मैं भी वहां था। सुबह-सुबह सब जाकर नेताजी के पास बैठ गए। मेरे एक साथी मुझसे बात कर रहे थे। नेताजी को हमें देख समझ में आ गया कि कोई समस्या है। वो दस-पंद्रह पत्रकारों के बीच सीधे मुझसे मुखातिब हुए और बोले क्या बात हो गई? मैंने उन्हें पूरा किस्सा बताया।

 

दरअसल एक सभा कवर करने के बाद एक दिन पहले रात को मैं सैफई की ओर बढ़ रहा था। लगातार बिना आराम के कार चलाते-चलाते ड्राइवर को नींद लगने लगी थी। लेकिन सही समय पर नजर पड़ गई तो एक दुर्घटना से हम बच गए। नेताजी ने गंभीरता से सुना और कहा कि आप लोगों का जीवन भी हम लोग की तरह है। चुनाव में काम बहुत बढ़ जाता है। सुरक्षा का ख्याल रखा कीजिए। उन्होंने कहा कि वह गाड़ी से चलते हैं तो ध्यान रखते हैं कि निरंतर दौड़भाग से ड्राइवर को कहीं नींद तो नहीं आ रही है। जब भी ऐसा हुआ कि ड्राइवर को नींद आ रही तो गाड़ी रुकवाने के बाद उनको काली मिर्च खाने को बोलता हूं और फिर कहता हूं – थूक दो। ऐसा करने से दो तीन घंटे के लिए नींद उड़ जाती है। फिर हम सबको बोले कि आप सब काली मिर्च कार में साथ लेकर चला करो।

 

मुलायम का वो आखिरी ‘सलाम’

नेताजी की खूबी थी कि सामने वाले के हाव-भाव से पहचान लेते थे कि वह क्या चाहता है? 2009 का लोकसभा का चुनाव था। उस समय में एक चैनल में यूपी कवर करता था। एक दिन उस समय हमारे संपादक का फोन आया कि चैनल पर सबका वन टू वन चल चुका है लेकिन मुलायम सिंह यादव का नही पहुंचा। वह होना चाहिए। चुनाव के समय बड़े नेताओं की कई सभाएं होती हैं। आमतौर पर पत्रकारों के लिए उपलब्धता यही होती है कि उनके साथ हेलीकॉप्टर में चला जाए या शाम को सभाओं के बाद मिले। लेकिन अगले दिन सुबह लखनऊ से उड़ने के बाद रात उनके लौटने का कार्यक्रम नहीं था। विभिन्न चैनलों के साथी अगले दिन कवरेज के लिए ओबी वैन के साथ प्रयागराज पहुंच रहे थे। उस दिन उनकी एक सभा रायबरेली के एक गांव में भी थी, जहां मीडियाकर्मियों की संख्या कम रहनी थी। मुझे लगा कि वहां कुछ मिनट बात की जा सकती है।

 

नेताजी वहां सभा को संबोधित कर मंच से उतर रहे थे। मैं मंच के पास खड़ा था। लाउडस्पीकर पर समाजवादी पार्टी का गाना तेज़ आवाज़ में बज रहा था और जिंदाबाद का शोर… मुझे सिक्योरिटी वाले उनके पास जाने नहीं दे रहे थे। मैंने झूठ ही बोल दिया कि जाने दीजिए, नेताजी ने बुलाया है लेकिन वो बढ़ने नहीं दे रहे थे। तभी सीढ़ी से उतरते समय उस भीड़ में नेताजी की नजर मेरी ओर हुई और उन्होंने सिक्योरिटी को रास्ता देने का इशारा किया। उन्होंने मुझसे बात की। बात खत्म होने के बाद मुस्कुराए और बोले – “लेकिन मैंने बुलाया नहीं था।” आप सोचिए कि भयानक शोर में दूर खड़े मुलायम सिंह यादव ने समझ लिया था कि मैं सिक्योरिटी से क्या कह कर अंदर घुसने की कोशिश कर रहा था। ऐसे तमाम किस्से है।

मौत से भी 8 दिनों तक दंगल लड़ते रहे नेताजी, आखिरी समय तक हार न मानने की जिद

वह एक किसान परिवार से निकल ऊंचाइयों तक पहुंचे थे इसीलिए जनता का दुःख दर्द समझते थे। यूपी में कामकाज की भाषा हिन्दी बनाना हो या फिर उर्दू को दूसरी भाषा का दर्जा दिलाना। यह मुलायम सिंह यादव की नजर थी। रक्षा मंत्री बने थे तो स्पष्ट किया कि हमारा बड़ा दुश्मन पाकिस्तान नहीं, चीन है। नेताजी की तिब्बत के समर्थन की सोच थी। ‘रोटी कपड़ा सस्ती हो, दवा पढ़ाई मुफ्ती हो’ यह मुलायम सिंह का ही नारा था। वह जब मुख्यमंत्री बने तब सरकारी अस्पताल में 10 रुपए का पर्चा बनता था, नेताजी ने उसे एक रुपए कर दिया। जब उनसे पूछा गया कि जब एक रुपए किया है तो मुफ्त भी कर सकते थे? उन्होंने कहा कि ऐसे में गरीबों का सम्मान बना रहेगा कि वह पैसा देकर इलाज करा रहे हैं। कहा जा सकता है कि मुलायम सिंह यादव के निधन के साथ राजनीति के एक युग का अंत हो गया है।

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