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Exclusive:महिला एवं बाल विकास विभाग की टीम ने दिखाई संवेदनशीलता, बिन माँ-बाप के बच्चाें के लिए महिला अधिकारी बनें सहारा

बालोद.सोचिए,अगर 10-11 साल के उम्र में किसी बच्चे के सिर से माँ-बाप का साया ही उठ जाए, तो मासूमों को कितनी तकलीफ उठानी पड़ सकती है। ऐसा ही एक वाक्या बालोद जिले के गुरूर विकासखण्ड के ग्राम बोरतरा में देखने को मिला, जहां 11 साल के गौरव चंदेल और 9 साल की उनकी बहन अमरिका चंदेल के सिर से मां-बाप का साया उठ गया है। उनके मां-बा इस दुनिया में नहीं है।

8 साल पहले गौरव के पिता दाऊराम चंदेल चल बसे और चार महीने पहले अप्रैल 2022 में उनकी मां श्यामा बाई इस दुनिया से चली गई। इन मासूमों के पास न तो रहने के लिए ढंग का घर है और न ही खाने पीने कि लिए कुछ चीजें। बारिश में टूटी हुई छप्पर वाले कच्चे मकान में रहना, कितना खतरनाक हो सकता है यह जानते हुए भी दोनों भाई-बहन वहां रह रही थी और दोनों अपने उज्जवल भविष्य का सपना संजो रहे थे।

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महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारियों के साथ गौरव और अमरिका

मासूमों की यह पीड़ा ग्राम पंचायत बोरतरा के जिम्मेदारों के समझ में तो नहीं आया, लेकिन ममतामयी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता इंदु नेताम का दिल मासूमों का कष्ट देख रहा नहीं गया। उन्होंने जागरूकता दिखाते हुए मासूमों का सहयोग की दिशा में पहल की।

21 जुलाई को 2022 को जब महिला एवं बाल विकास की पर्यवेक्षक प्रतिमा गोस्वामी बोरतरा आंगनबाड़ी केंद्र का निरीक्षण के लिए पहुंची, तब उन्होंने, पर्यवेक्षक प्रतिमा गोस्वामी को मासूम गौरव और अमरिका चंदेल की आपबीती सुनाई। पर्यवेक्षक गोस्वामी ने बिना देरी किए महिला बाल विकास विभाग के अपने साथी सुपरवायजर रूपाली कश्यप, रीता लहरे और मधुमिता को फोन कर बुलाया और सभी मासूम से मिलने उनके घर गए। जब 9 साल की अमरिका ने कच्चे मकान खोला तो वहां की परिस्थिति देख महिला एवं बाल विकास विभाग के पर्यवेक्षकों की टीम हतप्रभ रह गए।

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महिला एवं बाल विकास की पर्यवेक्षक चूल्हा में रखे खाना को चेक करती हुईं

वहीं बातचीत के दौरान मासूमों ने बताया कि मां के चले जाने के बाद दो माह गांव में अपने रिश्तेदार के घर पर रहे और जैसे ही स्कूल शुरू हुआ। दोनों अपने घर में ही रहकर पढ़ाई करने के लिए आ गए। स्कूल से मध्यान्ह भोजन के रूप में जो चावल दाल मिला था। उसकी रात में खिचड़ी बनाकर खा लेते थे और दिन का खाना स्कूल में हो जाता था।

… काहे का डर

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घर का दरवाजा खोलती हुई मासूम अमरिका चंदेल

पर्यवेक्षकों ने पूछा कि अकेले रहने में डर नहीं लगता तो मासमूों ने कहा कि डर भी लगेगा तो क्या कर सकते हैं? इसलिए तो अपने ही घर में रहना पसंद किया है। दरसअल पर्यवेक्षकों ने कच्चा मकान की दीवारों पर दरारें, टूटी हुई छप्पर, मकान में सीलन देख मासूमों से ऐसा सवाल किया था।

एसडीएम ने दिखाई गंभीरता

पूरा वाक्या समझने के बाद पर्यवेक्षक प्रतिमा गोस्वामी ने इसकी सूचना गुरुर एसडीएम रश्मि वर्मा को दी और बच्चों की वस्तुस्थिति से अवगत कराया। एसडीएम ने गंभीरता दिखाई और बच्चों से मिलने ग्राम बोरतरा पहुंची। उन्होंने घर जाकर बच्चों की वस्तु स्थिति का जायजा लिया। दोनों बच्चे को पोस्ट मैट्रिक गर्ल्स हॉस्टल गुरुर पहुंचाने के निर्देश दिए। जब तक उनके रहने और पढ़ाई की समुचित व्यवस्था नहीं हो गई, तब तक भाई- बहन हॉस्टल में रही। हॉस्टल में काम करने वाले अधिकारी कर्मचारी और दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों ने आपस में राशि सहयोग दोनों बच्चों की दैनिक जरूरत की सामग्री उपलब्ध कराया।

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पोस्ट मैट्रिक छात्रावास में बच्चों के साथ महिला बाल विकास विभाग की अधिकारियों की टीम

इस बीच एसडीएम वर्मा बच्चों के संरक्षण की दिशा में पहल की और बाल संरक्षण समिति ने बच्चों के रिश्तेदार से संपर्क कर प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी करवाई। ताकि दोनों भाई-बहन ब्वायज और गर्ल्स हॉस्टल में रहकर अपनी पढ़ाई कर सके। प्रक्रिया पूरी होने के बाद दोनों को 3 अगस्त को घोटिया हॉस्टल में शिफ्ट किया गया।

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हॉस्टल का खर्च उठाने कि लिए महिला अधिकारी तैयार

हॉस्टल भले ही शासकीय है, लेकिन कुछ चीजों के लिए शुल्क देना पड़ता है। ऐसे में महिला एवं बाल विकास विभाग के पर्यवेक्षकों ने दोनों बच्चों के हाॅस्टल पर होने वाले खर्च की जिम्मेदारी भी उठाने की बात कही है। चादर, कंबल खरीदकर दिए हैं। वहीं एसडीएम रश्मि वर्मा ने दाेनों बच्चों के लिए कपड़े खरीद कर दिए हैं।  उन्होने हॉस्टल अधीक्षक गोदावरी बालेंद्र को बच्चों का विशेष ध्यान रखने कहा है।

 

 

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हास्टल में दोनों बच्चे

इस कहानी में सबसे बड़ी बात यह है कि मासूमों का सहयोग करने वालों में मातृशक्तियों की भूमिका महत्वपूर्ण है। चाहे वह आंगनबाड़ी कार्यकर्ता का जागरूकता हो या फिर महिला एवं बाल विकास विभाग की टीम एवं अनुविभागीय अधिकारी रश्मि वर्मा ने संवेदनशीलता का परिचय दिया है। वह प्रशंसनीय है।

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